एक चिंगारी अब भी जली है..
क्या करें, क्या न करें?
कैसे करें और कब करें?
सवालों ने झकझोर दिया ज़िंदगी को।
कहकर भी न कह पाए।
सुनकर भी अनसुनी सी है।
देखकर भी अनदेखा सा है।
रास्ते अनेक, पर कोई राह नहीं।
मंज़िल भी धुंधली सी है।
आगे कांटे और गड्ढे हैं,
मीलों तक कुछ भी नहीं।
हाथ अपनों ने थामा है,
पर ये साथ कब तक है?
किस्मत ने भी छोड़ दिया साथ।
किस-किस से लड़ें और कब तक?
अपनों से, समाज से या खुद से?
लड़ाइयाँ अनेक, ताक़त सीमित।
सब कर-कर भी सिर्फ़ मिट्टी हाथ आई।
हौसले ने भी छोड़ दिया साथ।
किसके सहारे खड़े हों?
क्यों खोजें बाहर?
अंदर ही तो सब है।
एक चिंगारी अब भी जली है,
थोड़ी हवा की प्यासी है।
आँधी आए या तूफ़ान,
खुद का हाथ नहीं छोड़ेंगे।
आख़िर तक ले जाएंगे खुद को।
हार मानना विकल्प नहीं।
रोड़े अनेक, पर
चलते रहेंगे,
रुक-रुक कर ही सही।
Comments
Post a Comment